जीतना न जाने ईवीएम टेढ़ा

हमारे यहाँ नाकामी को बिलकुल ही पसंद नहीं किया जाता| उस पर “लोग क्या कहेंगे?” का डर उसे औरभी नापसंद बना देता है| वैसा ही कुछ हमें हमारी खामियों को स्वीकार करनेमें भी है| अगर हम ख़ुद ऐसे हैं तो हमारे राजनेता भी हमसे कैसे अलग हो सकते हैं? और यह बात हालही में संपन्न हुए पांच राज्यों के चुनाव परिणामों से साबित भी हो गई| वैसे भी हमारे नेताओंको अपने कुछ कर्मो को साबित करनेमे ज़्यादा महेनत नहीं करनी पड़ती|

पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से हमारे देशमें चुनाव, चाहे वो कोर्पोरेशन का हो या लोकसभा का, ईवीएम मशीन से ही होता है| एक तरफ हम देश को आगे ले जाना चाहते हैं, पर दूसरी और हमारे कुछ भोलेभाले राजनेता चाहे वे किसी भी पार्टीसे संबंध रखते हो, अपनी हार पचाने की जगह उस हार का दोष वो इन्ही ईवीएम मशीनों को दे बैठते हैं| पांच राज्यों के चुनाव परिणामोंने, खासकर उत्तर प्रदेश के परिणाम जो अपनेआप में ऐतिहासिक है, ईवीएम मशीनों के कामकाज पर जबरदस्ती सवाल खड़े कर दिए है|

कुछ सवाल कुदरती होते हैं, तो कुछ बेकारमें अपने मन को या अपने चाहनेवालों के मन को बहलाने के लिए खड़े किये जाते हैं, ईवीएम पर उठ खड़े हुए प्रश्न दूसरी तरह के प्रश्न हैं| हम सब जानते हैं की भारत की हर एक पार्टीने, खासकर सुश्री मायावती और युगपुरुष श्री अरविन्द केजरीवालने इस बारेमें क्या कहा है इसलिये में उसे दोहराकर आपका और मेरा कीमती समय बर्बाद नहीं करूंगा| पर, में इस बात पर जरूर अपनी राय दूंगा की भारत के राजनीतिज्ञों को मेच्योर होने की कितनी आवश्यकता है, ये हकीकत ईवीएम पर उठाये गये कुछ बेतुके सवालों ने साबित कर दिया है|

जब हार होती है, और वह भी भयानक हार, तो बहुत तकलीफ़ होती है| यह तकलीफ़ वाकई में कैसी होती है और उसका मानसिक और शारीरिक असर कितना गहरा होता है वो आप किसीभी हारे हुए खिलाड़ी से पूछ सकते है, पर उस खिलाड़ीने कभी भी अपनी हार का ठीकरा उस मैदान पर या अपने खेल के साज़ोसामान पर नहीं फोड़ा वह भी एक सनातन सत्य है| हाँ, खिलाडिओं को कुछ समय ज़रूर लगता है अपनी उस भयंकर हार से उबरने में, पर वो बादमें ज़रूर उठ खड़ा होता है और फिर वोही खिलाड़ी, उसी मैदानमे उसी साज़ोसामान के साथ जीत भी दर्ज करतें हैं|

आये दिन हमारे राजनेता, हर चुनाव के बाद बोलतें है, खासकर तब जव वे या उनकी पार्टी हार जाती है, की चुनावों में हार-जीत तो लगी रहती है, और फिर वहीँ नेता अपनी कमियों पर ध्यान न दे कर हार का कोई फ़िल्मी कारण ढूंढ ही लेते हैं| नेता ऐसा इसलिये कर सकते हैं क्यूंकि उन्हें पता है की जनता बेचारी कहाँ जायेगी? एक ना एक दिन तो उसे मेरे ही पास आना है, आज नहीं तो पांच साल बाद! और फिर अगला चुनाव आते ही इस सरकार के बुरे काम गिना कर वो खुद आनेवाले पांच सालों के लिए गद्दीनशीन हो जाता है|

पर समय अब बदल रहा है और इस बदलाव को मायावती या केजरीवाल जैसे नेता शायद समझ नहीं रहे या फिर जानबूझकर समझना नहीं चाहते| सोशियल मीडिया का लाभ सबको लेना है, पर आज तक सोशियल मिडिया की नब्ज़ पकड़नेवाले कितने नेता आपने और मैंने देखे? जिस जिस नेता या पोलिटिकल पार्टीने इस नब्ज़ को समझा और परखा है उस उस नेता या पार्टीने पिछले तीन-चार साल में हुए महत्तम चुनावोंमें सफलता हांसिल की है|

मायावती के उस आरोप को की मुसलमान कैसे भाजपा को वोट दे सकता है, को सोशियल मिडियाने दुसरे ही दिन प्रमाणों के साथ निरस्त कर दिया था| तो केजरीवाल जिन्होंने दिल्ही महानगर निगम के आनेवाले चुनावों के लिए ईवीएम की जगह बैलेट का इस्तेमाल करने की बिनती चुनाव आयोग को की थी उन पर आइआइटी का छात्र होने पर भी पिछड़ी सोच रखने पर सोशियल मिडिया में आजकल काफ़ी मज़ाक हो रहा है|

मैं उम्र के उस वर्ग से आता हूँ जिसने बैलेट का ज़माना भी देखा है और ईवीएम का ज़माना भी, और तभी जब कोई नेता ये बोलता है की अमरिका, ब्रिटेन या अन्य किसी विकसित राष्ट्र में तो ईवीएम नहीं यूज़ किया जाता, फिर हमें क्यों तकलीफ़ हो रही है? तब बहूत हंसी भी आती है और गुस्सा भी| तो भाई, इस सवाल का मेरा सीधासादा जवाब एक ही है की अमरिका, ब्रिटेन या अन्य विकासशील देश में बूथ कैपचरिंग का भी कोई इतिहास नहीं रहा| भारतमें एक समय ऐसा था की ‘बूथ मेनेजमेंट’ का कोई अलग  ही मतलब निकलता था|

बूथ कैपचरिंग क्या चीज़ होती है वो आप अपने घर के किसीभी व्यक्ति से पूछ सकते हैं जिसकी उम्र पैंतीस से ज़्यादा है| ऐसी कई पुरानी बोलीवुड फ़िल्में भी आप देख सकते हैं जिसमें बूथ कैपचरिंग को बखूबी दिखाया गया है| जो लोग हार न पचा कर सिर्फ ईवीएम का विरोध करते हैं क्या उनकी इस बात का हम यह मतलब निकालें की उन्हें फिर वोही बूथ कैपचरिंग वाला ज़माना चाहिए,ताकि वे अपनी जूठी या बनी बनाई लोकप्रियता के नाम पर गलत तरीके से सत्ता पर आसीन हो जाएँ?

शुरूमें मैने बात की थी राजनीती में मेच्योरिटी की ज़रूरत की, ईवीएम का विरोध सिर्फ़ अपने पार्टी के सदस्यों या सपोर्टर्स को हार भुलाने या फिर समझाने बुझाने तक सिमित होती तो शायद एक हफ़्ते में सब भूल भी जाते, पर इस चर्चाने धीरेधीरे बड़ा स्वरूप लेना शुरू किया है, उस परसे यह लगता है की शायद हमारे कुछ राजनेता अभी भी पुराना ज़माना बाय हुक ओर क्रूक वापिस लाना चाहते हैं क्यूंकि वो उनकी ज़रूरतों को आसानी से पूरा करता है ना की जनता की आकांक्षाओं को|

इन पांच राज्यों के चुनावों में जो भी पार्टी हारी हैं उन्हें आत्मचिंतन के अलावे इस मेच्योरिटी पर भी ध्यान देना चाहिए| वैसे ये बात सत्तापक्ष को भी उतनी ही लागू होती है, क्यूंकि हमने देखा है की सत्ता के मदमें ऐसे कई नेता हैं जो टीवी चैनल का माइक सामने आते ही, न बोलनेवाले बोल ही बोल देते हैं| भारत युवाओं का देश है और भारत के आज के युवा को बोल बचन नहीं पर ज़मीन पर हुए काम पर ज़्यादा विश्वास होता है|

आज का वोटर यह चाहता है की विरोध हो पर उसमें शब्दों की मर्यादा हो जिससे किसीके भी आत्मसन्मान को चोट न पहोंचे, और यहाँ तो हम जनता ने दिए मैंडेट पर ही सवाल उठ खड़े कर रहे हैं! इतना कहनेमें क्या जाता है की हां हमसे कुछ चूक हो गई इस लिए हम हार गये, अब और महेनत करेंगे और अगले चुनावों मैं जीत कर दिखाएँगे? देश का स्मार्ट वोटर सब समझता है और अगर आप कुछ भी अनापशनाप बकेंगे तो वो उसका हिसाब आप से लेगा ही लेगा|

आज के नेताओं को चाहिए की अपना आचरण पब्लिकमें सुधारें| एक दुसरे का विरोध  करें  और भरपूर  करें, पर शालीनता न भूलें| संसद चलने दें, नाहीं की आप विपक्ष में हैं और सरकार आप से किसी एक मुद्दे पर सहमत नहीं है तो पूरा सत्र ही बिना साबुन धो डालें| विरोध मज़ाकिया अंदाज़ में भी हो सकता है, जैसे वाजपेयी जी करते थे, या फिर लोहिया जी|  भले ही आप हर चीज़ में राजनीति करें पर उसका जनता पर क्या असर हो सकता है उस पर भी दो मिनिट ज़रूर विचार करें| जब सोच के यह दो मिनिट बीस मिनिट में परिवर्तित हो जायेंगे तब भारत की राजनीति अपनेआप मैच्योर हो जायेगी|

स्टम्प्स!!!

अमरिका के प्रमुख के चुनावों में बैलेट से वोटिंग होती है और इन वोटों की गिनती पूरी होनेमें एक से दो हफ्तों का समय लग जाता है| अमरिका के अलग अलग राज्यों में वोटों की गिनती के अलग अलग नियम हैं|

 

१८/०३/२०१७, शनिवार

अहमदाबाद

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